गांधी के गांव और शास्त्री के किसान की कसौटी पर आज का भारत


भारत के गांव बदल रहे हैं। जिस गांव को कभी देश की अर्थव्यवस्था का आधार माना जाता था, वहां अब खेती के साथ डिजिटल सेवाएं, बैंकिंग, सड़क, इंटरनेट, छोटे उद्यम और नई तकनीक पहुंच रही है। किसान भी केवल हल और बैल तक सीमित नहीं है। उसके हाथ में मोबाइल है, खेत में ड्रोन पहुंच रहा है और सौर ऊर्जा से लेकर मौसम की जानकारी तक खेती के नए साधन उसके सामने हैं। फिर भी एक सवाल अपनी जगह कायम है कि इस बदलते गांव और बदलते किसान की दिशा क्या वही है जिसकी कल्पना गांधी और शास्त्री ने अपने अपने समय में की थी?

2 अक्टूबर की तारीख इस सवाल को और महत्वपूर्ण बना देती है। इसी दिन 1869 में महात्मा गांधी का जन्म पोरबंदर में और 1904 में लाल बहादुर शास्त्री का जन्म मुगलसराय में हुआ था। दोनों के जन्म के बीच लगभग 35 वर्ष का अंतर था, लेकिन भारत के कुछ मूल प्रश्नों ने दोनों को एक दूसरे से जोड़ दिया। गांधी के सामने भारत का गांव था और शास्त्री के सामने भारत का किसान। गांधी गांव को स्वावलंबी और आत्मनिर्भर सामाजिक इकाई के रूप में देखते थे, जबकि शास्त्री ने किसान को भारत की खाद्य सुरक्षा और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता के केंद्र में स्थापित किया।

गांधी के लिए गांव केवल कृषि उत्पादन की जगह नहीं था। उनके रचनात्मक कार्यक्रम में ग्राम स्वच्छता, खादी और ग्रामोद्योग, बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य, महिलाओं का उत्थान, किसानों और श्रमिकों की चिंता तथा सामाजिक सुधार जैसे विषय शामिल थे। ग्राम स्वराज की उनकी कल्पना में गांव अपने निर्णयों और अपनी आवश्यकताओं के समाधान के लिए अधिक सक्षम हो, यह महत्वपूर्ण था। स्थानीय संसाधन, स्थानीय श्रम और स्थानीय भागीदारी इस सोच के महत्वपूर्ण आधार थे।

लाल बहादुर शास्त्री के सामने परिस्थितियां अलग थीं। स्वतंत्रता के बाद देश खाद्य संकट, आर्थिक कठिनाइयों और सुरक्षा चुनौतियों से गुजर रहा था। ऐसे समय में उन्होंने किसान को राष्ट्रीय जीवन के केंद्र में रखा। उनका प्रसिद्ध आह्वान जय जवान, जय किसान केवल एक नारा नहीं था। इसमें देश की सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा को समान महत्व देने की भावना थी। शास्त्री के लिए किसान खेत में अन्न पैदा करने वाला व्यक्ति भर नहीं था, बल्कि राष्ट्र की आत्मनिर्भरता का महत्वपूर्ण आधार था।

आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अपनी विकास यात्रा को तेज करने की बात कर रहा है, तब गांधी और शास्त्री की की दृष्टि से वर्तमान भारत देखना स्वाभाविक है। सवाल यह है कि गांधी के ग्राम स्वराज और शास्त्री के किसान सम्मान की धारणाएं आज की विकास नीतियों में किस रूप में दिखाई देती हैं।

गांधी के समय गांव की आत्मनिर्भरता का आधार स्थानीय उत्पादन, स्थानीय श्रम, ग्रामोद्योग और सामुदायिक सहयोग था। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। गांव में बैंकिंग, इंटरनेट, डिजिटल भुगतान, बिजली, मोबाइल और आधुनिक संचार व्यवस्था पहुंच चुकी है। इसलिए आज का ग्राम स्वावलंबन भी अपने पुराने रूप में नहीं हो सकता। उसे आधुनिक तकनीक और बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ना होगा।

SVAMITVA योजना इसका एक उदाहरण है। ड्रोन सर्वेक्षण के माध्यम से ग्रामीण आबादी क्षेत्रों की संपत्तियों के अधिकार संबंधी दस्तावेज तैयार किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य संपत्ति की स्पष्ट पहचान और स्वामित्व अभिलेख तैयार करना है। 29 जनवरी 2026 तक देश के 1.86 लाख गांवों में 3.06 करोड़ से अधिक संपत्ति कार्ड तैयार किए जा चुके थे। छत्तीसगढ़ में 2,557 गांवों के लिए 1,96,757 संपत्ति कार्ड तैयार किए गए थे। सरकार के अनुसार इन संपत्ति कार्डों के आधार पर बैंक ऋण भी वितरित किए जा रहे हैं।

यह स्थानीय संपत्ति, स्थानीय संस्थाओं और स्थानीय आर्थिक क्षमता को मजबूत करने का उद्देश्य है। गांधी के समय गांव के पास जमीन, श्रम और स्थानीय उत्पादन सबसे बड़ी पूंजी थी। आज स्पष्ट संपत्ति अधिकार और डिजिटल व्यवस्था उस पूंजी को आर्थिक अवसर में बदलने का नया रास्ता खोल सकती है।

अब शास्त्री के किसान की ओर लौटें। उनके समय किसान के सामने सबसे बड़ा प्रश्न था देश के लिए पर्याप्त खाद्यान्न पैदा करना। आज किसान की चुनौती कहीं व्यापक है। उसे उत्पादन के साथ लागत, मौसम, सिंचाई, बाजार, बीमा, ऋण, भंडारण और तकनीक जैसे अनेक प्रश्नों से एक साथ जूझना पड़ता है।

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि वर्तमान कृषि नीति में प्रत्यक्ष आय सहायता का प्रमुख उदाहरण है। इसके तहत पात्र भूमिधारी किसान परिवारों को प्रतिवर्ष 6,000 रुपये तीन समान किस्तों में सीधे बैंक खातों में दिए जाते हैं। जुलाई 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पीएम किसान को 2026 से 2031 तक जारी रखने के लिए 3.15 लाख करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय को मंजूरी दी। सरकारी जानकारी के अनुसार योजना शुरू होने के बाद 23 किस्तों के माध्यम से 4.47 लाख करोड़ रुपये से अधिक सीधे किसानों के खातों में हस्तांतरित किए जा चुके हैं।

यहां शास्त्री के किसान की अवधारणा का आधुनिक संदर्भ दिखाई देता है। उनके समय किसान को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा का आधार मानने की आवश्यकता थी। आज किसान को उत्पादन के साथ आर्थिक सुरक्षा और निवेश की क्षमता देने की आवश्यकता है। हालांकि किसान की दीर्घकालीन समृद्धि केवल प्रत्यक्ष सहायता से संभव नहीं होगी। बेहतर बाजार, सिंचाई, भंडारण, कृषि प्रसंस्करण, तकनीक और उपज का उचित मूल्य भी उतने ही आवश्यक हैं।

आज कृषि में तकनीक का प्रवेश इस बदलाव को और स्पष्ट करता है। ड्रोन, मौसम की जानकारी, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, किसान क्रेडिट कार्ड, फसल बीमा, डिजिटल भुगतान और सौर ऊर्जा जैसी व्यवस्थाएं खेती को पारंपरिक उत्पादन व्यवस्था से आगे ले जा रही हैं। गांधी स्थानीय संसाधनों और आत्मनिर्भरता पर जोर देते थे और शास्त्री किसान को राष्ट्रीय शक्ति का आधार मानते थे। आधुनिक तकनीक इन दोनों चिंताओं को नए संदर्भ में जोड़ने की क्षमता रखती है।

गांव की आत्मनिर्भरता का एक बड़ा सवाल रोजगार का भी है। 1 जुलाई 2026 से Viksit Bharat G RAM G Act लागू हुआ है। इसके तहत ग्रामीण परिवारों को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में 125 दिनों के अकुशल मजदूरी रोजगार की वैधानिक गारंटी दी गई है। नई व्यवस्था ग्रामीण रोजगार को जल सुरक्षा, ग्रामीण अधोसंरचना, आजीविका संबंधी परिसंपत्तियों और टिकाऊ विकास से जोड़ती है। इसी तारीख से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 को निरस्त कर नई व्यवस्था लागू की गई।

यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि ग्रामीण रोजगार को केवल मजदूरी तक सीमित रखने के बजाय उसे टिकाऊ परिसंपत्तियों के निर्माण से जोड़ने का प्रयास किया गया है। जल संरक्षण, ग्रामीण अधोसंरचना और आजीविका से जुड़ी परिसंपत्तियां गांव की उत्पादक क्षमता बढ़ा सकती हैं। इस दृष्टि से रोजगार और ग्राम विकास को एक साथ देखने की कोशिश दिखाई देती है।

आज का भारत चरखे से ड्रोन तक और बैलगाड़ी से डिजिटल कृषि तक की लंबी यात्रा कर चुका है। साधन बदल गए हैं, गांव बदल गए हैं और किसान की आवश्यकताएं भी बदल गई हैं। लेकिन गांव को सक्षम बनाने और किसान को राष्ट्र की समृद्धि के केंद्र में रखने का प्रयास आवश्यक है।

गांधी के गांव और शास्त्री के किसान की कसौटी पर आज के भारत को देखने का सकारात्मक पक्ष यह है कि ग्रामीण संपत्ति अधिकार, प्रत्यक्ष किसान सहायता, तकनीक, पंचायतों की क्षमता और ग्रामीण रोजगार के क्षेत्र में नए प्रयोग हो रहे हैं।  चुनौती यही है कि गांव विकास का केवल लाभार्थी न रहे, बल्कि विकसित भारत का सक्रिय निर्माता बने और किसान सहायता पाने वाला व्यक्ति भर नहीं, बल्कि देश की आर्थिक शक्ति का सशक्त भागीदार बने।

आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

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